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Sunday, 30 June 2013

नारी तेरे रूप अनेक

नारी शक्ति की पुंज  हो तुम
फिर क्यूँ अबला कहलाई हो ।
                    पानी दूध की सरिता हो
                   यह मौन स्वीकृति पाई हो ॥

ममता प्रेम की मूरत हो तुम
विश्वास क्षमा की धागी हो ।
              हर पूण्य तुम्ही से पुष्पित है
              तुम ही बगिया की माली हो ॥

अँधेरे में चादनी सी हो
तुम मंद पवन सी शीतल हो ।
             सूरज की रश्मि जैसी तुम
            रौशन करती हर गुलशन हो ॥

हर घाव पे मरहम जैसी हो
धुप में बदली की छाव हो तूम ।
                    सुने मरुस्थल में हरदम
                   बन के आई बरसात हो तुम ॥

तुम बोझ वहन  करती इतना
अपमान के घूंट भी पीती हो ।
                तेरी उपमा से धरती भी
               आज धरती माँ कहलाई है ॥

जब-२ तेरे धैर्य को तोडा  गया
चंडी रूप बनाई  हो तुम ।
               कभी चंदमुखी कभी सूर्यमुखी
                कभी ज्वालामुखी बन आई हो तुम ॥

तुम भूल न जाना शक्ति को
शिव भी बिन तेरे अधुरा  है ।
                  सीता राधा के आगे बिना
                 राम कृष्णा का नाम न पूरा है ॥  

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