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Friday, 3 February 2012

मन!!!!!

मन से बड़ा न शत्रु कोई ,मन से बड़ा न मीत |
मन जग अँधियारा करे , मन ही जलाये दीप ||  

मन परिवर्तन शील है , मन के भेद अपार |
मन को वश में कर न सके , ऋषि मुनि गए हार ||

मन के अन्दर मैल जो,  बुरा दिखे संसार |
मन ज्यों-२ निर्मल हुआ, छाई शांति अपार || 

वस्तु व्यक्ति जो आज प्रिय,कल से नहीं सुहाय |
आज हितैषी परम है , कल दुश्मन बन जाय ||

मन में कटुता व्याप्त तो ,वाणी भी कटु होय |
मन भीगा जो प्रेमरस,बरसे अमृत होय  ||

मन से हम निष्क्रिय हैं , मन से बलि अपार |
मन से हम विजयी बने,मन से जाते हार ||

मन चंचल उधिग्न है, मन है सरल सुधीर |
मन से उन्छिख्ल  हुए ,मन से शांति गंभीर ||

मन जो लगी साधू संग ,उतारे भाव से पार |
जो कुशंग किश्ती चढ़े,डूब गए मझधार  ||